विनोद जी का जीवन क्षण-क्षण और रक्त का कण-कण राष्ट्र को समर्पित था : दीपक विस्पुते

भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्रद्धेय विनोद जी का संपूर्ण जीवन राष्ट्रकार्य, संगठननिष्ठा और समाज के प्रति संवेदनशीलता का अनुपम उदाहरण था। उनके जीवन का क्षण-क्षण और कण-कण राष्ट्र को समर्पित था। उनका जीवन केवल संघ की कार्यपद्धति को समझने का माध्यम नहीं, बल्कि संघमय जीवन जीने की प्रेरणा भी है। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह बौधिल प्रमुख दीपक विस्पुते ने श्रद्धेय विनोद जी की स्मृति में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में व्यक्त किए। सभा में पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी, अशोक जी पांडे, गोरेलाल जी तथा अन्य वरिष्ठजनों ने श्रद्धेय विनोद जी के साथ बिताए संस्मरण साझा करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
दीपक विस्पुते ने कहा कि विनोद जी उच्च शिक्षित थे और चाहते तो अपने लिए एक सफल व्यावसायिक जीवन चुन सकते थे, किंतु उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन संघकार्य के लिए समर्पित किया। लगभग 55 वर्षों के प्रचारक जीवन में उन्होंने प्रांत प्रचारक, क्षेत्र प्रचारक और केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य जैसे दायित्वों का निर्वहन किया। उनकी कार्यपद्धति में सूक्ष्मता, आग्रहपूर्वक कार्य करने की क्षमता, व्यक्ति की परख और कार्यकर्ताओं की चिंता जैसे गुण स्पष्ट दिखाई देते थे। उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार जी को प्रत्यक्ष देखने का अवसर भले ही नहीं मिला, लेकिन विनोद जी जैसे व्यक्तित्वों को देखकर यह समझा जा सकता है कि संघमय जीवन कैसा होता है। संघ को केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि विनोद जी जैसे समर्पित कार्यकर्ताओं के जीवन से समझा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि उनके जीवन में आकर्षण और आत्मप्रचार से दूरी का सहज आदर्श दिखाई देता था। दीपक जी ने अपने जीवन का संस्मरण साझा करते हुए बताया कि जब वे स्वयं प्रचारक के दायित्व से मुक्त होकर घर जाने का विचार कर रहे थे, तब विनोद जी ने उनसे जो संवाद किया और मार्गदर्शन दिया, उसका प्रभाव ऐसा रहा कि उनके मन में दोबारा वह विचार नहीं आया। उन्होंने कहा कि विनोद जी के चित्र के समक्ष पुष्प अर्पित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके जीवन से प्रेरणा लेकर उसे अपने आचरण में उतारना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
सामाजिक समरसता के कार्यों में विनोद जी का मार्गदर्शन था महत्वपूर्ण – शिवराज सिंह चौहान
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने श्रद्धेय विनोद जी के साथ निकटता से कार्य करने के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता से जुड़े अनेक वैचारिक निर्णयों और योजनाओं में विनोद जी की दृष्टि एवं मार्गदर्शन महत्वपूर्ण रहता था। संत रविदास महाकुंभ, टंट्या मामा भील और भीमा नायक से जुड़े कार्यों तथा योजनाओं में उनकी अंतर्दृष्टि का विशेष योगदान रहा। उन्होंने कहा कि विनोद जी सामाजिक समरसता के विषयों को गहराई से समझते थे और उनके मार्गदर्शन में समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने की दृष्टि मिलती थी।
श्री चौहान ने विनोद जी के व्यक्तित्व के एक विशेष पक्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि वे बाहर से अत्यंत कठोर दिखाई देते थे, लेकिन उनका हृदय बहुत कोमल था। उनके व्यवहार में अनुशासन और आत्मीयता का अद्भुत समन्वय था। उन्होंने विनोद जी से जुड़े अन्य संस्मरण भी साझा किए और कहा कि यदि हम उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करें, तो निश्चित रूप से भारत माता को परम वैभव तक पहुंचाने के कार्य में अपना योगदान दे सकेंगे।
प्रचारक का जीवन अदृश्य होते हुए भी प्रत्येक हृदय में विराजता है – कप्तान सिंह सौलंकी
पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी ने कहा कि श्रद्धांजलि सभा केवल श्रद्धासुमन अर्पित करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह विनोद जी के जीवन को जानने, समझने और उनसे प्रेरणा लेकर उनके आदर्शों के अनुरूप जीवन जीने का संकल्प लेने का अवसर भी है। उन्होंने कहा कि प्रचारक का जीवन भले ही बाहरी दृष्टि से अदृश्य रहता हो, लेकिन वह अपने कार्य, व्यवहार और आत्मीय संबंधों के माध्यम से असंख्य लोगों के हृदय में स्थायी स्थान बना लेता है।
श्री सोलंकी ने विनोद जी के साथ बिताए अनेक संस्मरण साझा किए। अंतिम दिनों की स्मृति बताते हुए वे भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि कुछ दिन पहले जब उन्होंने अस्पताल में विनोद जी से बात करने का प्रयास किया, तब उनकी स्थिति देखकर वे व्यथित हो गए थे। वे बोल नहीं पा रहे थे और उन्हें ऑक्सीजन पाइप लगी हुई थी। इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने विनोद जी के प्रति अपनी आत्मीयता और उनके जाने से उत्पन्न रिक्तता को व्यक्त किया।
प्रतिज्ञा को जीवन में उतारना विनोद जी से सीखना चाहिए – अशोक पांडे
अशोक जी पांडे ने श्रद्धेय विनोद जी को कार्यकर्ता की चिंता, समाज के प्रति संवेदना, जीवन की प्रमाणिकता और भविष्य को देखने वाली दूरदृष्टि का प्रतिरूप बताया। उन्होंने कहा कि विनोद जी का जीवन अनुकरणीय है। किसी विचार और प्रतिज्ञा को केवल शब्दों तक सीमित न रखकर उसे अपने जीवन में कैसे उतारा जाता है, यह विनोद जी के जीवन से सीखा जा सकता है। उनका प्रत्येक कार्य समाज और संगठन के प्रति समर्पण की भावना से प्रेरित था। श्री पांडे ने हृदय की संपूर्ण पवित्रता के साथ उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए।
सात्विकता, सहजता और संगठनात्मक दृढ़ता का अनुपम समन्वय – गोरेलाल
क्षेत्र घुमंतू कार्य प्रमुख गोरेलाल जी ने अपने विस्तृत संस्मरणों में विनोद जी के सात्विक व्यक्तित्व, सहज व्यवहार, कार्यकर्ता-हित की चिंता और संगठनात्मक दृढ़ता का उल्लेख किया। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के सात्विक कर्ता के लक्षणों वाले श्लोक “मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥” का उल्लेख करते हुए कहा कि आसक्ति और अहंकार से मुक्त रहकर धैर्य, उत्साह तथा सफलता-असफलता में समान भाव बनाए रखने के ये गुण विनोद जी के जीवन में सहज रूप से दिखाई देते थे।
उन्होंने कहा कि मूलतः उत्तर प्रदेश से आने वाले विनोद जी ने संघकार्य में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। दायित्वों से मुक्त होने के बाद उज्जैन में रहते हुए भी उनकी दिनचर्या और कार्यनिष्ठा में कोई शिथिलता नहीं आई। नियमित व्यायाम, स्नान-ध्यान, जप-तप, बाबा महाकाल के दर्शन और आरती में सहभागिता तथा समाज के विभिन्न वर्गों एवं कार्यकर्ताओं से सहज संवाद उनके जीवन का अभिन्न अंग बने रहे। बड़े दायित्वों से मुक्त होने के बाद भी उन्होंने अपने व्यवहार में न कोई बदलाव आने दिया और न ही मिलने वालों की संख्या में परिवर्तन को अपने मन पर प्रभावी होने दिया।
गोरेलाल जी ने बताया कि विनोद जी व्यक्तियों की क्षमताओं को पहचानकर उन्हें समाज और संगठन के कार्यों से जोड़ने में विशेष दक्ष थे। घुमंतू समाज से जुड़े ऐसे व्यक्तियों को, जो आगे चलकर इंदौर में उद्योग स्थापित कर चुके थे, उन्होंने आत्मीयता से संघकार्य से जोड़ा। दीपावली मिलन जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने उद्योग जगत के लोगों को एकत्र किया और धीरे-धीरे उन्हें संघ की विचारधारा से परिचित कराया। यह उनके संबंध निर्माण की सहज और प्रभावी कार्यपद्धति का उदाहरण था।
उन्होंने महाकौशल में प्रांत प्रचारक के रूप में विनोद जी के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए बताया कि वे कार्यकर्ताओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे। किसी वरिष्ठ कार्यकर्ता का दायित्व बदलते समय उसकी भावनाओं और सक्रियता का ध्यान रखते थे, वहीं संगठन विरोधी गतिविधियों के मामलों में आवश्यक कठोर निर्णय लेने से भी पीछे नहीं हटते थे। उनका हृदय मातृवत कोमल था, लेकिन संगठन के हित में निर्णय लेते समय वे दृढ़ और अनुशासित रहते थे।
प्रयागराज कुंभ के दौरान लगभग एक माह तक उनकी सक्रियता का उल्लेख करते हुए गोरेलाल जी ने बताया कि वे वहां आने वाले पुराने कार्यकर्ताओं, साधु-संतों और पूर्व प्रचारकों के आतिथ्य तथा उनकी सक्रियता बनाए रखने के लिए सतत प्रयासरत रहे। उनकी चिंता रहती थी कि कोई भी पुराना कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित या निष्क्रिय अनुभव न करे, बल्कि समाजकार्य में अपनी भूमिका निभाता रहे।
गोरेलाल जी ने अपनी अंतिम भेंट का उल्लेख करते हुए बताया कि देहावसान से चार दिन पूर्व बड़ौदा-मेरठ प्रवास के दौरान उनकी विनोद जी से मुलाकात हुई थी। अस्वस्थता के बावजूद उनके भीतर संकल्प और कार्य के प्रति समर्पण का भाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था। उज्जैन पहुंचने के लगभग 12 घंटे के भीतर उन्होंने देह त्याग दी। उनकी शवयात्रा के समय एक पुराने कार्यकर्ता के भावुक शब्दों को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि विनोद जी अनेक लोगों के लिए ऐसे आत्मीय आश्रय थे, जिनके सामने वे अपने मन की बात रख सकते थे और मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते थे।
गोरेलाल जी ने कहा कि विनोद जी के व्यक्तित्व में मातृ-हृदय की करुणा, पितृ-हृदय की चिंता और गुरु-हृदय का मार्गदर्शन एक साथ दिखाई देता था। उनका जीवन आज के सामाजिक कार्यकर्ताओं को यह सिखाता है कि कितना बोलना चाहिए, क्या बोलना चाहिए और कैसा आचरण करना चाहिए।
श्रद्धांजलि सभा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं संघ प्रेरित संगठनों के वरिष्ठ पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और विनोद जी से आत्मीय संबंध रखने वाले अनेक लोगों ने भावपूर्ण श्रद्धासुमन अर्पित किए। सभा के उपरांत सभी उपस्थितजनों ने मौन रखकर श्रद्धेय विनोद जी को नमन किया और उनके चित्र पर पुष्प अर्पित किए।






