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सहकारिता में डिजिटल क्रांति

सहकारिताओं ने बढ़ाया डिजिटल कदम

प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर विश्व की 300 सहकारी समितियों में भारतीय कृषक उर्वरक सहकारी लिमिटेड (इफको) और गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ (अमूल) क्रमश: पहले और दूसरे पायदान पर हैं। वर्ल्ड को-ऑपरेटिव मॉनिटर-2022 संस्करण में मिली यह उपलब्धि भारतीय सहकारिताओं की क्षमता का सिर्फ एक उदाहरण है। देश में सहकारिताओं ने हर उस वर्ग और क्षेत्र तक विकास के उजाले को पहुंचाया है, जहां शासन-प्रशासन की पहुंच नहीं थी। दूध, खाद, चीनी, बैंकिंग सेवाओं से लेकर दैनिक जरूरत की हर वस्तु और सेवाएं उपलब्ध कराने में सहकारी समितियों की अहम भूमिका है। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की 2019-2020 की रिपोर्ट के मुताबिक सहकारी डेयरी ने 1.7 करोड़ सदस्यों से प्रतिदिन 4.80 करोड़ लीटर दूध खरीदा। चीनी उत्पादन के क्षेत्र में सहकारी मिलों की हिस्सेदारी लगभग 35 प्रतिशत है। भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2017 तक देश में 8 लाख 54 हजार 355 सहकारी समितियां थीं। इनमें सदस्यों की संख्या 30 करोड़ से अधिक है। कृषि क्षेत्र में सहकारी समितियां किसानों को बीज, खाद, कीटनाशक और रियायती दर पर ऋण उपलब्ध कराने से लेकर कृषि उत्पादों का उचित मूल्य मुहैया कराने का कार्य करती हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2012 को सहकारिताओं का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया था। 1895 में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता गठबंधन के मुताबिक दुनिया की कुल आबादी का 12 फीसदी 30 लाख सहकारी समितियों में प्रत्यक्ष सहकार की भूमिका में है। ये सहकारिताएं विश्व में सृजित कुल रोजगार में 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखती हैं। भारत में सहकारिता ने कृषि, बैंकिंग,ऋण, खाद्य प्रस्संकरण, भण्डारण, विपणन, डेयरी, मत्स्य और आवास व्यवस्था में एक बड़ी भूमिका निभाई है। गरीबी उन्मुलन, खाद्य सुरक्षा और रोजगार सृजन में भारतीय सहकारिता ने सफलता की सर्वोत्तम कहानियां गढ़ी हैं।

सहकार से समृद्धि की यह यात्रा सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) के साथ स्मार्ट टेक्नोलॉजी से उत्प्रेरित है। आईसीटी आधारित सेवाओं से सहकारिताओं के क्षमता संवर्धन को नया आयाम दिया जा रहा है। कृषि चक्र, मौसम के पूर्वानुमान, मांग और आपूर्ति की ऑनलाइन जानकारी समेत सहकारी गतिविधियों के दैनिक क्रियाकलाप तकनीक और नवाचार से प्रभावी शक्ल ले रहे हैं। सहकारिताओं में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के यह अनुप्रयोग रेडियो, सेटेलाइट, टेलीविजन,टेलिफोन, कंप्यूटर, इंटरनेट से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के रूप में देखा जा सकता है।

AI और क्लाउड कंप्यूटिंग अपना रही सहकारिताएं

डेयरी सहकारी समितियों की क्षमता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) ने नवीन प्रौद्योगिकीय आधारित समाधान प्रक्रियाओं को अपनाया है। यह हितधारकों की जरुरत पर आधारित एप्लिकेशन को विकसित एवं क्रियान्वित करके तकनीकी सहायता प्रदान करती है। अमूल के जरिए देश में आई दुग्ध क्रांति की वाहक आधुनिक तकनीक और आईसीटी आधारित सेवाएं हैं। अमूल जियोग्राफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम (जीआईएस) जैसी तकनीक को अपनाकर कारोबारी विस्तार के साथ ग्राहकों को बेहतर सेवाएं मुहैया करा रही है। कंपनी द्वारा दूध के परीक्षण, मापन और वितरण प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉनिक तकनीक का बेहतरीन उपयोग किया गया है। यह सब आईटी नेटवर्क की स्थापना से हुआ है। इसके अंतर्गत उत्पादन केंद्रों, वेंडर और ग्राहकों को वेरी स्माल अपर्चर टर्मिनल (वीसैट),मोबाइल और ई-मेल आधारित सेवाओं के जरिए एक मंच पर लाया गया है। सहकारिता क्षेत्र में अमूल के अनुभव का लाभ अब केंद्र सरकार किसानों की आय दोगुनी करने से जुड़ी अन्य परियोजनाओं में ले रही है। अमूल को जैविक उत्पादों के परीक्षण और प्रमाणन के लिए प्रयोगशाला स्थापित करने और कृषि उत्पादों के वैश्विक विपणन हेतु नोडल एजेंसी बनाया गया है।

अमूल को संचालित करने वाली कंपनी गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ (जीसीएमएमएफ) ने 2009 में आईबीएम के साथ समझौता किया। कंपनी ने अमूल के लिए डाटा सेंटर और डिजास्टर रिकवरी सिस्टम के साथ निजी क्लाउड विकसित किया है। आईटी सेवाओं को अपना कर अमूल ने अपने कारोबार में दस गुना वृद्धि की है। अमूल अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के जरिए आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावी रूप दे रहा है। दुग्ध उत्पादन के वास्तविक स्रोत का पता लगाने से लेकर वितरण से जुड़े रीयल टाइम डाटा की जानकारी एआई के अनुप्रयोग से मिलती है।

इफको, एयरटेल और सोलर ग्लोबल रिसोर्स लिमिटेड के बीच एक त्रिपक्षीय निकाय के रूप में इफको किसान सुविधा लिमिटेड (आईकेएसएल) का गठन किया गया है। इसके अंतर्गत किसानों को सिम कार्ड मुहैया कराने के लिए ग्रीन कार्ड अभियान चलाया गया। मोबाइल आधारित सेवाओं से इफको ने किसानों तक अद्यतम सूचनाओं और सेवाओं की पहुंच बढ़ाई है। कृषि चक्र से जुड़ी गतिविधियों की जानकारी, स्थानीय मौसम पूर्वानुमान, उत्पादकता बढ़ाने के उपाय, बीमारियों से जुड़े अलर्ट और सरकारी योजनाओं की जानकारी रिकॉर्डेड वॉइस मैसेज से मुहैया कराई जाती है. यहां तक की कृषि विशेषज्ञों से किसानों का संवाद भी स्थापित किया जाता है।

GEM पोर्टल : सहकारिताओं को मिला बाजार

सहकारिता मंत्रालय के गठन के साल भर के भीतर 100 करोड़ टर्नओवर वाली 289 सहकारी समितियों को ई-गवर्नमेंट मार्केटप्लेस (जेम पोर्टल) से जोड़ा जा चुका है। अगले चरण में 50 करोड़ और तीसरे चरण में उससे कम टर्नओवर वाली सहकारी समितियों को इस प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा। जाहिर है कि इन सहकारी समितियों से जुड़े लोग प्रत्यक्ष रूप से अपने उत्पाद की खरीद-बिक्री बड़े दायरे में कर सकेंगे। 97 हजार प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाया जा रहा है। कृषि अवसंरचना फंड के जरिए सभी जिलों में ई-विपणन प्लेटफॉर्म, वेयर हाउस, साइलोज, पैक हाउस, ग्रेडिंग यूनिट, शीत भण्डारण केंद्र स्थापित किये जा रहे हैं। इसका सीधा लाभ स्थानीय सहकारी समितियों को मिलेगा। सहकारिता मंत्रालय द्वारा सभी राज्यों की सहकारी समितियों के पंजीयकों के माध्यम से सहकारी समितियों को जेम पोर्टल पर बतौर विक्रेता ऑनबोर्ड करने का परामर्श जारी किया है। दूरस्थ इलाकों में सक्रिय सहकारी समितियों के जेम पोर्टल पर आने से इसका लाभ उत्पाद और सेवाएं प्रदान करने वाली सहकारी गतिविधियों को मिलेगा। यह वह लोग हैं जो एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) आधारित उत्पाद और सेवाएं मुहैया करा रहे हैं।

सहकारी बैंक: डिजिटल सेवाओं से विस्तार

देश बैंकिंग सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में सहकारिता क्षेत्र की अग्रणी भूमिका है। 1543 अर्बन को-ऑपरेटिव का डिजिटलाइजेशन किया जाना है इनमें 850 बैंक छोटे बैंक हैं। यह बैंक 100 करोड़ से कम टर्नओवर वाले हैं। आरबीआई की पहल पर नेशनल अर्बन को-ऑपरेटिव फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन का गठन किया जा रहा है। यह संगठन छोटे बैंकों को लागत सक्षम तकनीक की उपलब्धता सुनिश्चित करेगा। आधुनिक तकनीक को अपना कर ही सहकारी बैंक इंटरनेट बैंकिंग, एटीएम, नेट और मोबाइल बैंकिंग जैसी सुविधाएं ग्राहकों को प्रदान कर सकेंगे।

भारत में सार्वजनिक बैंक एक प्रतिशत से भी कम राशि आईटी सेवाओं पर खर्च करते हैं। निजी क्षेत्र के बैंक अपने मुनाफे का 4 से 5 प्रतिशत आईटी सेवाओं को अपनाने में खर्च करते हैं। शहरी सहकारी बैंकों में तो निजी क्षेत्र के बैंकों के मुकाबले आईटी सेवाओं पर होने वाला खर्च और भी कम है। यह अनुपात 0.5 प्रतिशत से 2 प्रतिशत के बीच है। हालांकि शहरी सहकारी बैंक तेजी से कोर बैंकिंग समाधान से जुड़ी तकनीक को अपना रहे हैं। इसके लिए नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर की सेवाएं काफी मददगार साबित हुई हैं। सहकारी बैंकों से जुड़ी को-ऑपरेटिव कोर बैंकिंग सॉल्यूशन (सीसीबीएस) से जुड़ी सेवाएं (हार्डवेयर और मानव संसाधन को छोड़कर) राष्ट्रीय सूचना केद्र द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं।

लिज्जत पापड़ : स्मार्ट टेक्नोलॉजी से बना ग्लोबल ब्रांड

मुंबई के गिरगांव के एक छोटे से घर से सहकारिता की भावना के साथ शुरू लिज्जत पापड़ आज एक वैश्विक ब्रांड बन चुका है। 2021 में श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ ने 21 हजार महिलाओं को रोजगार दिया। यह सहकारी संस्था हर दिन 48 लाख पापड़ तैयार करती है। कारोबार को विस्तार देने के साथ ग्राहकों को स्वाद के साथ उत्पाद की सुगम उपलब्धता के लिए संस्था ने उत्पादन व वितरण से जुड़ी सभी स्मार्ट तकनीकों को अपनाया है। अमेजन वेब सर्विस का उपयोग कर लिज्जत पापड़ महिला उद्योग ने हॉर्डवेयर लागत में 60 प्रतिशत की कमी की है। अमेजन ईसी-2 (इलास्टिक कंप्यूटर क्लाउड) वेब सर्विस के सुखद परिणामों से प्रोत्साहित संगठन ने डाटा अनुप्रयोग के लिए माइक्रोसॉफ्ट आधारित एमएसएसक्यूएल डाटाबेस का उपोयग किया है।

नाफेड : सहकारिताओं में गुणवत्ता संवर्धन को प्रोत्साहन

2 अक्टूबर को 1958 को स्थापित नेशनल एग्रीकल्चर को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लि. (नैफेड) सहकारी संस्थाओं के उत्पादों और सेवाओं के विपणन,प्रस्संकरण, भण्डारण के साथ ही उनके लिए कच्चे माल की उपलब्धता का शीर्ष निकाय है। नैफेड भारत सरकार के अधिकृत निकाय के रूप में विदेशों से तकनीक और सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने से जुड़े समझौते करता है। इसी कड़ी में नैफेड ने एग्रीटेक फर्म एग्रीनेक्स्ट के साथ साझेदारी की है। इसके अंतर्गत एग्रीनेक्स्ट महाराष्ट्र के कृषि उत्पादक संगठन (एफपीओ) के लिए दालों के गुणवत्ता संवर्धन हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। अरुणचाल प्रदेश एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड द्वारा उत्पादित कीवी के गुणवत्ता मूल्यांकन के लिए इसी तरह की साझेदारी की गई है। दरअसल गुणवत्ता मूल्यांकन की परंपरागत विधियों जहां व्यक्तिनिष्ठ और हस्तचालित (मैनुअल) रही हैं, वहीं अब तकनीक आधारित सर्वोत्तम प्रथाओं से गुणवत्ता संवर्धन के प्रयास सहकारिताओं के उत्पाद व सेवाओं को बाजार में टिकाऊ बनाते हैं।

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