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नहीं रहे सुभाष कश्यप, संविधान को जन-जन तक पहुंचाया

नई दिल्ली : 4 जून को सुभाष कश्यप का निधन देश के लिए एक गहरी छति है. वह प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ थे. उनकी पुस्तकें पढ़कर एक पूरी पीढ़ी ने अपना न सिर्फ करियर बनाया बल्कि संविधान के बारे में जागरुक हुई. वह लोकसभा के पूर्व महासचिव थे. वह 97 वर्ष के थे, अक्सर संवैधानिक संकट एवं संविधान की जहां व्याख्या की आवश्यकता होती थी, सुभाष कश्यप के लेख संदर्भित किए जाते थे. वह अक्सर टीवी डिबेट में भी शामिल होते थे. उनकी विद्वता अनुकरणीय थी. उन्‍होंने 100 से अधिक पुस्तकों के लेखन का काम पूरा किया. 1983 से 1990 तक उन्होंने लोकसभा के महासचिव का दायित्व भी निर्वहन किया. सुभाष कश्यप के निधन पर राजनीतिक, सामाजिक एवं अन्य क्षेत्र के दिग्गजों ने शोक व्यक्त किया. उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने डॉ. कश्यप के निधन पर शोक व्यक्त किया है. उन्‍होंने कहा कि ‘‘डॉ. कश्यप ने अपने शोध, लेखन और सार्वजनिक सेवा के माध्यम से भारत के संविधान और संसदीय लोकतंत्र की समझ में अमूल्य योगदान दिया.’’

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा, डॉ. कश्यप भारत के अग्रणी संवैधानिक विद्वानों में से एक थे, जिनका संसदीय और संवैधानिक चर्चा में योगदान समाज को समृद्ध करता है. प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के लिए उनका लेखन और प्रतिबद्धता उल्लेखनीय थी.

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि डॉ. कश्यप भारतीय संविधान और संसदीय प्रणाली के चलते-फिरते ज्ञानकोश थे. श्री बिरला ने कहा कि उनका निधन भारतीय संसदीय लोकतंत्र, संवैधानिक विमर्श और सार्वजनिक जीवन के लिए एक अपूर्णीय क्षति है. विधि, पत्रकारिता से लेकर सामान्य व्यक्ति को जब भी संविधान की पुस्तक पढ़नी होती थी, सुभाष कश्यप की लिखी किताबें काफी उपयोगी साबित हुईं. उन्होंने संविधान के सभी अनुच्छेदों का जितनी सुंदरता और मर्म के साथ विवरण किया वह अद्भभुत रहा. 2015 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों उन्हें पद्म भूषण सम्मान प्राप्त हुआ था. वह उत्तरप्रदेश के बिजनौर के रहने वाले थे.

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